Friday, January 8, 2021

कांकेर से मीरा आर्ची चौहान की रचना- सायक

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-सायक(तीर)
विधा-कविता (मुक्त छंद)

आँखों में घुसा तिनका
निकल ही जाता
एक दिन
दवा या दुआ से ।

पैर में गड़ा कांँटा
निकल  ही जाता
एक दिन
सुई या मलहम से ।

हाथों को चुभा काँच
निकल ही जाता
एक दिन,
सर्जरी या सडा़स से ।


औजारों से लगे चोट
ठीक हो भी जाते
एक दिन
अच्छी चिकित्सा से

पर दिल में चुभे सायक
शब्दों के मन को
 छलनी कर देते और
 नासूर बन जाते हैं ।

  जनाब ,वाणी का सायक
संभाल कर चलाइए
ऐ दुबारा लौटते नहीं
 जुबान के तरकस में।

मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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