जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-सायक(तीर)
विधा-कविता (मुक्त छंद)
आँखों में घुसा तिनका
निकल ही जाता
एक दिन
दवा या दुआ से ।
पैर में गड़ा कांँटा
निकल ही जाता
एक दिन
सुई या मलहम से ।
हाथों को चुभा काँच
निकल ही जाता
एक दिन,
सर्जरी या सडा़स से ।
औजारों से लगे चोट
ठीक हो भी जाते
एक दिन
अच्छी चिकित्सा से
पर दिल में चुभे सायक
शब्दों के मन को
छलनी कर देते और
नासूर बन जाते हैं ।
जनाब ,वाणी का सायक
संभाल कर चलाइए
ऐ दुबारा लौटते नहीं
जुबान के तरकस में।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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