रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाजार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विषय-" बसंत " ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"बसंत की बहार " ।
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=$=○|| बसंत की बहार ||○=$=
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प्रकृति के हैं,अनूठे रँग----
तीन मौसमों की सौग़ात दी,
भारत की वसुंधरा को,
सब ऋतुओं का महत्व है बड़ा,
इसलिए कभी गर्मी,कभी सर्दी तो,
कभी बरसात होती रहती है ।
शीत ऋतु की दाँस्ता है निराली,
जो पतझड़ के साथ मधुमास भी,
ले आती है,जो बसंत की बहार ,
बन दुल्हन और कभी विरहणी बन ,
प्रकृति का करती है श्रृंगार--।
धरती में बिछे,पीली-पीली चादर,
सरसों के फूलों की भीनी भीनी खुशबू,
और अमुआ के बौर की,
मदमस्त महक करती है पागल,
बसंत की बहार ,दे जाये ऐसी सौगात।
वनों की,हो जाती है--
हरियाली गायब और ढूठ से लगे पेड़,
लगता मानों,कोई उजाड़ बस्ती हो--?
पेड़ों से उतरती तनों से छाल और --
पेड़ों से झड़ते -टपकते पत्तों का ढेर,
धरती में रंग-बिरंगी,जैसे कोई कालीन
एक साथ बिछा दी गई हो --?
बसंतोत्सव की अलमस्ती और--
बगिया में खिले रंग-बिरंगे फूलों की,
रौनक व उससे फैलती सुगंध,
अनायास ही भौरों व तितलियों को ,
बरबस अपनी ओर खींच लेता है,
मधुमक्खियों का झुण्ड लुटता है,
फूलों का मकरंद व ले जाता छत्ते में,
पालता बच्चों को व शहद पैदा करता।
बसंत पंचमी में होती है--
ज्ञान की देवी सरस्वती जी का पूजन,
नौनिहाल को शहद से जीभ में लिखे,
ताकि अच्छे से बोलना-पढ़ना सीखे ।
राधा'कृष्ण व गोपियों की ठिठोली--
और होली की अजीब मस्ती,
रंगीन बना देता है,बसंत पर्व को,
लोग अपना दुःख-सुख भूल,
बसंत व होली की मस्ती के साथ,
झुमने-नाचने-गाने लगते फगुआ ।
साहित्यकारों,कवियों,गजलकारों ने,
इस मौसम व बसंत , प्रकृति-प्रेम की,
बातों पर ढेरों रचनायें ,सभी भाषाओं में अपने तरीके से लिख डाली है--।
बसंत की बहार सभी को--
बहुत ही भाता है,चाहे बच्चें हों,
या जवान,बूढ़े क्यों न हों,
अमराई में कोयल की कूक व
खट्टी मीठी बेरों का स्वाद लुभाते,
सब्ज़ियों-सलाद का स्वादिष्ट मजा,
सेहत बनाने का सबब बनते हैं--।
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