स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- कविता
शीर्षक-
*यादें कहार की*
डोली उठाये काँधे में,
सोचता होगा कहार
ये कैसा कर्म मेरा
जुदा करना पीहर का प्यार
माँ का दुलार ले चला, संग
पिता का अधिकार
दुल्हन रोये सिसक-सिसक
छूटता भैया का मनुहार
पिया मिलन की आस लिये
दुल्हन चली पराये घर,
ऐसी पीड़ा मन में लिये
करे पग-पग वह सफर,
ज्यों-ज्यों पालकी पहुँच रही
उस अनजानी सी शहर
नया उत्साह, नई उमंग
मन में उठती इक लहर
खुश रहेगी प्यारी दुल्हनिया
पहुँच अपने पिया के द्वार
अब जाने कहाँ गुम हुये।
पालकी और वो कहार ।।
......................................
No comments:
Post a Comment