डोंगरगाँव जिला राजनांदगाँव छत्तीसगढ़
विधा :- गीत
पगडंडी का हमराही
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मैं पगडंडी का हमराही हूँ ,
राजपथों की चाह नहीं .
कठिनाई मुँह बाँयें खड़ी है ,
फिर भी कोई आह नहीं .
मैं पगडंडी का हमराही हूँ ....
आग में तपकर ही सोना ,
कुन्दन बन जाता है .
घावों को जो मरहम दे ,
वो चन्दन कहलाता है .
धूप गली में जीवन गुज़रे ,
छाँव की कोई चाह नहीं .
कठिनाई मुँह बाँयें खड़ी है ....
तूफानों से लड़कर कश्ती ,
साहिल तक जाती है .
बाधाओं से लड़कर वह तो,
मंज़िल को पाती है .
काँटों से इस भरी डगर में ,
फूल की कोई चाह नहीं .
कठिनाई मुँह बाँयें खड़ी है.....
काँटों की राह पर चलकर ही,
नूतन राह बनाना है.
फूलों से ज्यादा खिलकर ही,
हँसना और हँसाना है .
हिम्मत हरदम साथ है मेरे ,
आँधी की परवाह नहीं .
कठिनाई मुँह बाँयें खड़ी है.....
मुझको भी तो प्रगति के,
अनगिन पथ ने ललचाये .
वासनाओं के मोह- जाल ने,
मुझे बहुत ही भटकाये .
" दीप " का जीवन सहज ही बीते ,
मान की कोई चाह नहीं .
कठिनाई मुँह बाँयें खड़ी है........
मै पगडंडी का हमराही हूँ.......
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गजेन्द्र हरिहारनो "दीप"डोंगरगाँव जिला-राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
( सर्वथा मौलिक एवं अप्रकाशित सृजन )
बहुत सुन्दर सर जी
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