Tuesday, January 5, 2021

महासमुंद से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- राब्ता

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- राब्ता 
विधा :- कविता
शीर्षक :- राब्ता होने लगा।

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रफ्ता - रफ्ता राब्ता होने लगा,
इक अजनबी से वास्ता होने लगा।
पहले पास आए फिर दूर हो गए,
मुमकिन है मुकद्दर खफा होने लगा।

दरख्तों के साये में छिपकर उन्हें देखते,
अहिस्ता - अहिस्ता उनसे वफ़ा होने लगा।
नीद - चैन अब कम हो गए हैं और,
बेचैनी में अब तो इजाफा होने लगा।

भीड़ खटकती है, काटने दौड़ती है भरी महफिल में,
तन्हाई से अब राब्ता होने लगा।
कहानियों में बोरियत का एहसास हो रहा है,
शेरो - शायरी से वास्ता होने लगा।

दिन के उजाले ना सुहाते हैं अब तो,
रात के अंधेरे से राब्ता होने लगा।
लेकर कलम भरने लगता हूं डायरी कई दफा,
कि अल्फाजों से अब तो वफ़ा होने लगा।

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