Saturday, January 30, 2021

कांकेर से मीराआर्ची चौहान की रचना- बसंत

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- बसंत
विधा-कविता (मुक्त छंद)

बसंत ! तुम आओ,
  संग में लेकर अपने
    आम की तरुणाई,
      बौर से लदी डाली।

   कोयल की  वो मीठी,
     कुहू-कुहू की बोली।
        शीतल वो मंद बयार,
          ढ़ोल- नगाड़े का थाप।।

 पीले सरसों की महक,
    चने की बजती घुंघरु।
       अंगारों -सा धधकता 
          खेत- मेड़ों पर पलाश।

   प्रियतमा की व्याकुलता,
     पपीहे की अकुलाहट।
      सारस  भी एकाग्रता से,
         बसंत का करता इंतजार । 

मीराआर्ची  चौहान
कांकेर,छग
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