जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- बसंत
विधा-कविता (मुक्त छंद)
बसंत ! तुम आओ,
संग में लेकर अपने
आम की तरुणाई,
बौर से लदी डाली।
कोयल की वो मीठी,
कुहू-कुहू की बोली।
शीतल वो मंद बयार,
ढ़ोल- नगाड़े का थाप।।
पीले सरसों की महक,
चने की बजती घुंघरु।
अंगारों -सा धधकता
खेत- मेड़ों पर पलाश।
प्रियतमा की व्याकुलता,
पपीहे की अकुलाहट।
सारस भी एकाग्रता से,
बसंत का करता इंतजार ।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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