सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-कविता
विषय-अश्क
अश्क बहा पूरी कर लेती थी
जो हर जिद अपना
दौड़े चले आते थे माँ-बाप
बहते अश्कों को देख
आज छलकते अश्कों को
पलकों में भींच लेती है
जब पूछता है कोई
पलकें झुका ,खुश हूं
यही सब से कहती है
हाँ चूंकि अब वह सिर्फ एक बेटी नहीं
सम्पूर्ण स्त्री बन चुकी है
अपनी सम्पूर्णता में वह
अश्कों को पीना सिख गई
अपने दर्द को छुपा
औरों के लिए मुस्कुराना सिख गई
दो घरों में बटी स्त्री को
जब -जब परायेपन का
अहसास कराया जाता है
लब खामोश रहते हैं
अश्कों से रात -रात भर
तकिया भिगोती है
अपने भारी मन को
अश्कों में बहा हल्का कर लेती है
अश्कों से वफादार
जग में दूजा कोई नहीं
जहाँ परछाई भी साथ छोड़ जाए
अश्क वहां भी मोहब्बत निभा जाते हैं।
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