रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
विषय-""रूह "" ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"" रूह "" ।
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○•○•|||••रूह••|||•○•○
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रूह दिखाई देती नहीं ----
पर हम महसूस करते हैं,
धड़कते दिल में,
बसती है सबकी रूह--।
तपस्या ऐसी कीजिए--
परमात्मा से रूह जुड़ जाय,
सदवाणी बसे विचारों में ,
तपस्वी बन ,जग का कल्याण करे ।
सद् पुरूषों की रूह--
बसा करती है पीर -फकीरों में,
बना करते हैं उनके मठ व मजारें ।
मृत शरीर से---
रूह हो जाती है अलग,
सिर्फ़ बच जाती है काया,
अन्तिम संस्कार कर के,
मिट्टी या राख बन जाती काया ।
पुनर्जन्म,परलोक की बातें जानें,
करेंगे अच्छे काम तो,
रहेगी हमारी पवित्र आत्मा ,
तभी मिले,अगले जन्म में,
अच्छी भौतिक काया--।
जिसने सांसारिकता को जान लिया,
दिनचर्या को,प्रभु भक्ति से,
जिसने अपना जीवन जोड़ लिया,
भवसागर तो उसका पार हो ही गया ।
रूह की पवित्रता रखना,
होता है इस दुनिया में मुश्किल,
मोह-माया के जाल में फंस कर,
भटकती रहती है,अपनों की आत्मा ।
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व्याख्या-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव जाति के लिए रूह की पवित्रता रखना होगा पर आज दुनियादारी में होता कितना मुश्किल है ।
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