Wednesday, December 2, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- सूर्य किरण

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'सूर्य किरण'
दिनाँक--०२.१२.२०
                  ०×××××××०
सूर्य किरण  देती प्रभा , करती  विश्व प्रकाश ।
उर्जा  देती  जगत  को , तम का करे विनाश ।।१।।
भानु किरण करते रही , रजनी का अवसान ।
खुशी  मनाती  है  धरा , देख प्रभा  दिनमान ।।२।।
सूर्य किरण है सदा ही , देतीं   रश्मि   विखेर ।
अंधकार जग से  मिटे , मिले  खुशी का ढेर ।।३।।
देख  पूर्व  में  लालिमा , पक्षी  सब  आनन्द ।
खुश  होके वे  चहकते , उड़ने  को  स्वच्छंद ।।४।।
दाने  की  है  खोज  में , जाते    चारों   ओर ।
गुंजित  भौंरे  बाग   में , वन   में   नाचे  मोर ।।५।।
पेड़-वनस्पति  हरित हैं , मन आनन्द अपार ।
प्रकाश  संश्लेषण  करें , निज भोजन तैयार ।।६।।
हर्षित हो  प्राणी जगत , होता  सक्रिय खूब ।
अपने दैनिक  काम  में , जाते  हैं  सब  डूब ।।७।।
पशु धन चरने को चले , उड़ने  लगती  धूल ।
ताल - तलैया -सरोवर , खिले पद्म के  फूल ।।८।।
धरती से है यह किरण , सोंखा  करती  नीर ।
सूर्य किरण हैं सोंखतीं , इस  धरती  से  नीर ।
वर्षा जल  बनके  वही , हरे   विश्व  का पीर ।।९।।
भानु प्रभा में विटामिन , रहता  'डी'  भरपूर ।
हड्डी  व्याधि  हरे  सदा , सेवन    करते   दूर ।।१०।।
सूरज - प्रकाश में  रहा , अनेक   सारे  तत्व ।
प्रभा बिना है विश्व का , मिट जाये अस्तित्व ।।११।।
दिननाथ प्रभु दया करें , जोड़े  'ठाकुर' हाथ ।
मन का तमस हरें सदा , करना  हमें  सनाथ ।।१२।।
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व्याख्या--इस रचना में सूर्य किरण की विशेषता
             एवं सूर्य का गुणगान किया गया है ।

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