स्थान--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'सूर्य किरण'
दिनाँक--०२.१२.२०
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सूर्य किरण देती प्रभा , करती विश्व प्रकाश ।
उर्जा देती जगत को , तम का करे विनाश ।।१।।
भानु किरण करते रही , रजनी का अवसान ।
खुशी मनाती है धरा , देख प्रभा दिनमान ।।२।।
सूर्य किरण है सदा ही , देतीं रश्मि विखेर ।
अंधकार जग से मिटे , मिले खुशी का ढेर ।।३।।
देख पूर्व में लालिमा , पक्षी सब आनन्द ।
खुश होके वे चहकते , उड़ने को स्वच्छंद ।।४।।
दाने की है खोज में , जाते चारों ओर ।
गुंजित भौंरे बाग में , वन में नाचे मोर ।।५।।
पेड़-वनस्पति हरित हैं , मन आनन्द अपार ।
प्रकाश संश्लेषण करें , निज भोजन तैयार ।।६।।
हर्षित हो प्राणी जगत , होता सक्रिय खूब ।
अपने दैनिक काम में , जाते हैं सब डूब ।।७।।
पशु धन चरने को चले , उड़ने लगती धूल ।
ताल - तलैया -सरोवर , खिले पद्म के फूल ।।८।।
धरती से है यह किरण , सोंखा करती नीर ।
सूर्य किरण हैं सोंखतीं , इस धरती से नीर ।
वर्षा जल बनके वही , हरे विश्व का पीर ।।९।।
भानु प्रभा में विटामिन , रहता 'डी' भरपूर ।
हड्डी व्याधि हरे सदा , सेवन करते दूर ।।१०।।
सूरज - प्रकाश में रहा , अनेक सारे तत्व ।
प्रभा बिना है विश्व का , मिट जाये अस्तित्व ।।११।।
दिननाथ प्रभु दया करें , जोड़े 'ठाकुर' हाथ ।
मन का तमस हरें सदा , करना हमें सनाथ ।।१२।।
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व्याख्या--इस रचना में सूर्य किरण की विशेषता
एवं सूर्य का गुणगान किया गया है ।
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