पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - छत्तीसगढ़ के कवि
विधा - आलेख
नारायण लाल परमार
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छत्तीसगढ़ अंचल के बहुत से कवियों एवं साहित्यकारों ने अपनी लेखनी से साहित्य को समृद्ध किया है। हिंदी के गौरवशाली इतिहास एवं छत्तीसगढ़ी की मिठास को अपने रचनाओं के माध्यम से जिन महान विभूतियों ने संजोया है , उन्ही के पद चिन्हों पर चलकर आज के नवोदित साहित्यकार न केवल हिंदी , छत्तीसगढ़ी बल्कि गोंडी , हल्बी , सरगुजिहा में भी अपनी छाप राष्ट्रीय स्तर पर बिखेर रहें हैं। पंडित सुंदर लाल शर्मा , मुकुटधर पांडे, लोचन प्रसाद पांडे , लखन लाल गुप्त , नारायण लाल परमार , पवन दिवान, पंडित श्याम लाल चतुर्वेदी , लक्ष्मण मस्तुरिया आदि उल्लेखनीय नाम हैं।
छत्तीसगढ़ अंचल में नारायण लाल परमार जी का नाम प्रतिष्टित साहित्यकारों में शुमार है। मूलतः गुजराती परिवार में जन्मे परमार जी का कर्मभूमि छत्तीसगढ़ का धमतरी जिला रहा। टाइमकीपर , शिक्षक और साहित्यकार के रूप में उन्होंने अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन किया। वे अपने स्कूली जीवन से लेखन कार्य प्रारंभ किये और आजीवन उससे जुड़े रहे।
१ जनवरी १९२७ को जन्में परमार जी का साहित्यिक सफर बहुत लंबा रहा , उन्होंने न केवल पद्य बल्कि गद्य में भी समान रूप से लेखन किये। उनकी रचनाएं - तन्वंगी यही नदी धार , दिन पके हुए , घर कहां हैं, दादाजी का खर्राटा , गिलहरी प्रसन्न है , तो छत्तीसगढ़ी में रेंगना सुहावत हे जैसे रचनाएँ लिखे। उनकी रचना बारहमासा की पंक्तियां हमें हिंदी के बारह मासों का महत्व व उनमें प्रकृति की छटा दिखलाते हमारी संस्कृति से जोड़ती है-
चैत्र महीने का प्यारा,
सुंदर रूप अनूप है ,
गरम हवा चलने लगती,
खट्टी - मीठी सी धूप है ,
वे बाल साहित्य के भी सशक्त हस्ताक्षर थे । उनकी दादाजी का खर्राटा बल साहित्य में खर्राटे की आवाज को रोचक तरीके से प्रस्तुत कर बालमन को सराबोर कर देते हैं :-
दूर - दूर तक गुंजा करता,
है दादाजी का खर्राटा ,
पत्ते थर-थर कांप रहें हैं,
पेड़ खड़े है हक्के - बक्के ,
बरामदे के हर खंभे के ,
मानो छूट रहे हैं छक्के ,
भरी दोपहर दूर - दूर तक,
नजर नही आता सन्नाटा ,
दूर- दूर तक गुंजा करता ,
दादाजी का खर्राटा ,
नारायण लाल परमार जी ने अपनी रचनाओं में स्वतंत्रता विषयक , श्रृंगार , नवरस , व्यवस्था विरोधी एवं बाल साहित्य सभी मे अपनी लेखनी चलाई।उन्होंने विभिन्न कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किये, एक चिंतक के रूप में रेडियो में विचार प्रस्तुत किया , उनकी रचनाएँ विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। उनकी इस साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए। लेखन में आदर्श प्रस्तुत करने वाले परमार जी २७ अप्रैल २००३ में धमतरी के एक अस्पताल में अपने अंतिम सांस ली । उनके कृति आज के युवावों के लिए प्रेरणा स्रोत है। उनके व उनकी रचनाओं पर कई साहित्यकार व पी.एच.डी. प्राप्त करने वाले प्रशिक्षु शोध कर डॉक्टर की उपाधि हासिल कर लिए और आगे भी करेंगें।
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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