Monday, December 21, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार कृत आलेख- ममता

रचनाकार उर्मिला सिदार
ग्राम - बुलाकी
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़ 
विधा - आलेख 
विषय - ममता
दिनांक - 21/12/2020
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               *ममता*
"ममता'' अस्तित्व के 28 मूल्यों में से एक मूल्य है। मूल्य का अर्थ है मौलिकता, मूल्य, मूल रूप में हर मनुष्य के अंतरात्मा में स्तुषि स्वरूप में विद्यमान है। इस स्तुषि (अंकुरण) को कैसे पल्लवित (विकसित) किया जाए, ताकि हर मनुष्य अपनी मूल में (मौलिकता) के साथ आचरण स्वरूप में व्यक्त हो पाए। इसी की प्रयास में मानव जाति विगत से प्रयासरत है।ममता मूल्य का अर्थ है पोषण, कोई भी मनुष्य किसी मनुष्य को अपना संबंधी स्वीकार कर उसकी शरीर पोषण के लिए मन, तन, धन समर्पित करने का भाव को ही उनका मूल्य(भाव) कहा जाता है। यह मूल्य प्रमुखत: मां में देखा जाता है। जिस मनुष्य में मानता का भाव कूट-कूट कर भरा रहता है वही मूल्य निर्वहन करने वालों का नाम ममता है। ममता मूल्य स्त्री में ही रहता है ऐसी बात नहीं है ममता मूल्य हर मानव में होता है लेकिन इस भाव के निर्माण से इसकी पहचान होती है। चाहे स्त्री हो या पुरुष हो जो संबंधी स्वीकार कर उसकी शरीर की पोषण की जिम्मेदारी लेते हुए ममता भाव, संबंधी के अंतरात्मा (जीवन) में रोपित करने का भाव ही ममता भाव है। मान लो किसी संबंधी की पोषण हुआ लेकिन उनके आत्मा में पोषण का बीज रोपित नहीं हुआ अर्थात उसके अंदर ममता का भाव जागृत नहीं हुआ ऐसी क्रिया को ममता नहीं कहा जाता स्वार्थ कहा जाता है। ममता भाव से ममता भाव का रोपण कर, इसकी परंपरा अस्तित्व में बने रहने के लिए ममता मूल्य का आचरण व्यवहार रूप में दिखाई देना ही ममता मूल्य है। ममता मूल्य प्रकृति प्रदत्त मां में प्रधानत: देखने को मिलती है और संरक्षण के रूप में पिता का दायित्व और कर्तव्य दिखता है। माता पोषण के अर्थ में ममता मूल्य को प्रकट करती है और पिता संरक्षण के रूप में वात्सल्य मूल्य को प्रकट करता है। पोषण, संरक्षण, ममता और वात्सल्य मूल्य हर माता-पिता में प्रधान मूल्य के रूप में स्थापित रहता है। जिसे संबंधी को स्वीकार कर मूल्यों का निर्वहन करने से ममता और वात्सल्य का भाव प्रकट होने से सुख की अनुभूति होती है।
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                          उर्मिला सिदार 
                            रायगढ़(छग)

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