जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - मुक्त कविता
शीर्षक - " माँ की ममता "
--------------------------------
माँ की ममता है अनमोल।
जिसका कोई नहीं है तोल।
महिमा माँ की है अपरंपार,
जननी माता चाहे जो बोल।।
माँ ममता की है खान।
कैसे करुँ मैं उसका बखान।
है पूजनीय है श्रध्देय मेरे,
मेरे लिए यही है भगवान।।
नौ महीने तक गर्भ में बच्चा,
फिर माँ कठिन दर्द उठाती है।
खून से सींचती हमको हर माँ,
ममता की नदी माँ बहाती है।।
बच्चों की प्यारी किलकारी सुनकर,
मुस्कान चेहरे में आ जाती है।
शिशु-स्वास्थ्य की रखती ध्यान,
वक्ष से दूध अपनी पिलाती है।।
शिशु का रोना बरदास्त न करती,
तुरंत गोद में उठा लाती है।
अपने ललना को लोरी सुनाकर,
निंदिया रानी को फिर बुलाती है।।
भूख से व्याकुल देख बच्चे को,
अपनी भूख भूल जाती है।
तड़पती रहती ज्वर से फिर भी,
बेटे के लिए खाना पकाती है।।
बेटा अब हो गया बड़ा,
माँ से जुबान लड़ाता है।
माँ की ममता को बिसरा कर,
नरक का रास्ता क्यों बनाता है।।
प्रेमजाल में फंसकर बेटा,
प्रेमिका का क्यों हो जाता है।
दूध का तू कर्ज भूलाकर,
माँ को ही क्यों रुलाता है।।
ममता की गोद में रखकर,
बड़े नाजों से जिसने पाला था।
प्यार में आज ओ अंधा होकर,
ममता की हत्या कर डाला था।।
माँ के तो चरणों में बसती,
चारों तीर्थ चारों धाम है।
ममता का जो मोल समझ लिया,
असली बेटा उसी का नाम है।।
------------****----------------
मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
Nice mosa ji
ReplyDeletethank u ji
Delete