जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - मुक्त कविता
शीर्षक - " मोर बस्तर "
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इन्द्रावती के कोरा म बिराजे,
बस्तरिया सब मोर भाई हे।
सरग उतरे भुइंया म इहांके,
अऊ देवता बरोबर जम्मो रूख-राई हे।।
कल-कल करत हे नदिया के लहरा,
झरना मन गीत गावत हे।
परवत पठार जंगल डोंगरी,
पहुना माने बर बुलात हे।।
गुरतुर-गुरतुर बस्तरिहा बोली,
आदिवासी इहाँ के चिन्हारी हे।
झूठ लबारी ल नई जानय,
मया पीरित के व्यापारी हे।।
आनी-बानी के खनिज भरे,
पावन ऐ भुइंयाँ म।
सीधा-साधा इहाँ के मनखे,
सुरता ले थोरकुन छइंहा म।।
माँ दंतेश्वरी के महिमा ह,
अंजोर इहाँ बगरात हे।
बस्तर के दशहरा दुनिया भर म,
छत्तीसगढ़ के मान बढ़ात हे।।
बस्तर छत्तीसगढ़ के शान हे।
खतरा म ये मन के परान हे।
पुरखा ल संजोये संस्कृति ल जेमन,
हमर गरभ हमर अभिमान हे।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
👌👌👌
ReplyDeleteGood is good
ReplyDeleteBahut khub👌
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