जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - मुक्त कविता
शीर्षक - " छोटा शहर ऐसा हो "
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छोटा शहर भले ही मेरा हो।
ताजगी हवा से शुरू सवेरा हो।
है ख्वाहिश ऐसे ही शहर की,
जहाँ सभी प्रिय बंधु-भाई मेरा हो।।
प्रदूषण का जहाँ न संकट हो।
पानी की जहाँ न कोई झंझट हो।
नल से पहुँचे शुध्द जल हर घर,
हर समस्या का निराकरण जहाँ झटपट हो।।
नाली की समय पर सफाई हो।
बीच-बीच में दवा छिड़काई हो।
हर गली-मोहल्ला हो स्वच्छ,
जागरुक मेरा हर बहन-भाई हो।।
आवागमन का उचित साधन हो।
महिलाओं हेतू महिला प्रसाधन हो।
न हो असुरक्षित औरत कभी,
रात्रि में ऐसी सुरक्षा व्यवस्थापन हो।।
ईमानदार कानून का रखवाल हो।
हर बेटी-बहू के आबरु का देखभाल हो।
न जाये जान किसी भी बेटी की,
सिर उठा चल सके ऐसा माहौल हो तो कमाल हो।।
शहर में ऐसा अस्पताल हो।
आपातकल पर इलाज तत्काल हो।
औपचारिकता न बने जान का दुश्मन,
किसी गरीब मरीज का न कभी काल हो।।
पक्का सबका मकान हो।
उपलब्ध सभी को परिधान हो।
न दिखे कोई भूख से तड़पता,
हर व्यापारी के कार्य का सम्मान हो।।
हकीकत मेरा यह सपना हो।
विकास शहर का अपना हो।
मिले हर सुख-सुविधा यहाँ,
उन्नति ही शहर का गहना हो।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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