Thursday, November 12, 2020

बलौदाबाजार से लीलाधर कुम्हार कृत आलेख- धनतेरस पर्व

रचनाकार - लीलाधर कुम्हार
जिला - बलौदाबाजार ( छ. ग. )
विषय - धनतेरस
विधा - आलेख
शीर्षक - धनतेरस पर्व
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       // धनतेरस पर्व //

       भारतीय सनातन संस्कृति पूरे विश्व मे अद्वितीय और महान है । यहाँ के पर्व , पूजा पद्धति , रीति - रिवाज आदि सब पूर्णतः वैज्ञानिक और प्रेरणादायी है । वैसे तो हर रोज कोई न कोई त्योहार , तिथि या शुभ लग्न आता ही है किंतु मुख्य रूप से 40 बड़े पर्व हिन्दू धर्म मे होते हैं । इनमे से एक भी पर्व या त्योहार शोक का नही है । सारे पर्व खुशी , आनन्द , उत्साह एवं सात्विकता का संचार करती है जो प्रकृति या पर्यावरण से संबद्ध होती है । पर्वों का पुंज दीपावली एक ऐसा ही पर्व है ।
      दीपावली पाँच त्योहारों का समूह है । पहला पर्व है धनत्रयोदशी या धनतेरस । इस दिन समुद्र मन्थन से भगवान धन्वंतरि जी का प्राकट्य हुआ था जिन्हें आयुर्वेद का प्रथम आचार्य माना जाता है । शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि इस दिन यमराज को मन्त्र सहित दीपदान करने से यमराज देव की प्रसन्नता प्राप्त होती है एवं अकाल मृत्यु नहीं होती । मंत्र इस प्रकार है -
 '' मृत्युना पाशदण्डाभ्यां 
              कालेन च  मया सह ।
त्रयोदश्यां दीपदानात्
            सूर्यजः  प्रीयतामिति ।। ''
        ( स्कंदपुराण वैष्णव खण्ड )
        आज ही के दिन राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया जाता है । सन् 2016 से इसकी शुरुआत हुई थी । आयुष मंत्रालय द्वारा इस बार पाँचवे आयुर्वेद दिवस की वृहत तैयारी की गई है । कोरोना समय तो आयुर्वेद की महत्ता और भी ज्यादा बढ़ गई है । 
        धनतेरस के दिन नई वस्तु खरीदने की परम्परा है । बाजार से सोना ,चांदी ,बर्तन कपड़े आदि क्रय करना शुभ माना जाता है । स्वछता का महत्व तो है ही । बरसात के बाद और ठंड के पूर्व आनेवाला यह पर्व अनेक दृष्टियों से लाभकारी है ,मंगलकारी है । सनातन हिन्दू की महानता व उपयोगिता अकथनीय है , अद्वितीय है ।

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