जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-धनतेरस
विधा-कविता (मुक्त छंद)
मन करता है धनतेरस का
दीपक बन कर मन के
कोने में पसरे कालिख,
अंधकार को दूर भगाऊं|
कुंभकार का दीया बनकर,
चेहरे का मुस्कान बन जाऊं|
हर एक देहरी को रोशन कर,
गाँव गली के तम हर लाऊं||
पकवानों की खुशबू बनकर,
हर गृहणी का घर महकाऊं,
खीर,बताशा ,पेठा बनकर,
सबके मुँह मीठा कर आऊं|
घर-आंगन की रांगोली बनकर,
लिपे-पुते आंगन को चमकाऊं|
फूलझड़ी की उन सप्त रंगों से,
नन्हें बच्चों की खुशियाँ महकाऊं
धनवंतरी भगवान के आयुर्वेद का,
घर -घर में मैं अलख जगाऊं|
एक दीया मैं वीर शहीदों के नाम,
हर देहरी में रोशन कर आऊं||
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
_,__,,__,,__________________
No comments:
Post a Comment