Thursday, November 12, 2020

कांकेर से मीरा आर्ची चौहान की रचना- धनतेरस

रचयिता का नाम-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-धनतेरस
विधा-कविता (मुक्त छंद)

मन करता है धनतेरस का
दीपक बन कर मन के
कोने में पसरे कालिख,
अंधकार को दूर भगाऊं|

कुंभकार का दीया बनकर,
 चेहरे का मुस्कान बन जाऊं|
हर एक देहरी  को रोशन कर,
 गाँव गली के तम हर लाऊं||

पकवानों की खुशबू बनकर,
हर गृहणी का घर महकाऊं,
खीर,बताशा ,पेठा बनकर,
सबके  मुँह मीठा कर आऊं|

घर-आंगन की रांगोली बनकर,
लिपे-पुते आंगन को चमकाऊं|
फूलझड़ी की उन सप्त रंगों से,
नन्हें बच्चों की खुशियाँ महकाऊं

धनवंतरी भगवान के आयुर्वेद का,
घर -घर में मैं अलख जगाऊं|
एक दीया मैं वीर शहीदों के नाम,
हर देहरी में रोशन कर आऊं||

मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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