जिला - बलौदाबाजार ( छ. ग. )
विषय - प्रेरणा स्त्रोत : एक साहित्यकार
विधा - आलेख
शीर्षक - अनोखे साहित्य प्रेमी
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// अनोखे साहित्य प्रेमी //
फकीर सिंह क्षत्री एक ऐसा नाम है जिसे चाहूँ तो भी मैं नहीं भुला सकता । उनके जैसा साहित्य प्रेमी मैंने अपने जीवन में प्रत्यक्ष और नहीं देखा । ग्रामीण अंचल का एक सामान्य गरीब आदमी साहित्य से इतना लगाव रखे व अपनी रचना को अपने बच्चे की तरह लाड़ - प्यार करे , उसे संभाले , जतन से रखे , यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है । ये कोई बड़े साहित्यकार नहीं है । इनको कोई पुरस्कार नहीं मिला है एवं कोई पुस्तक भी नहीं छपी है । तो भी इनके प्रति मेरे दिल मे बड़ा सम्मान है और एक प्रकार से मेरे प्रेरणास्रोत हैं ।
बलौदाबाजार और भाटापारा के बीच एक गाँव है अर्जुनी । मैं वहीं के सरस्वती शिशु मंदिर में जुलाई 1997 से सितंबर 1998 तक आचार्य रहा । उसी स्कूल में फकीर सिंह क्षत्री भी पढ़ा रहे थे । वे हट्टे - कट्टे और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे । वे एक - एक शब्द को तौल - तौल कर सारगर्भित ढंग से मधुरतापूर्वक बोलते थे । एक छोटी सी डायरी और पेन हमेशा रखते थे । जब भी समय मिलता , वे लिखते रहते थे । हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनो में ही समान रूप से काव्य रचना करते थे ।
सबसे बड़ी बात वे अपनी कविता को हृदयपूर्वक जी - जान से चाहते और यत्नपूर्वक सहेजकर रखते थे । किसी अखबार व पत्रिका में उनकी रचना छपती तो कटिंग करके उसे एलबम या फाइल में सजाकर रखते । फटे - पुराने कटिंग को भी प्रकाशित तिथि व पत्र या पत्रिका के नाम सहित फाइल में चिपकाकर इस तरह व्यवस्थित करते ताकि सुंदर , टिकाऊ और आकर्षक लगे । जो भी उनके सम्पर्क में आता , उसे बड़े चाव से वे अपनी कविता जरूर सुनाते एवं उस एलबम अथवा फाइल को दिखाना नहीं भूलते । यदा - कदा स्थानीय स्तर के कवि सम्मेलनों में भी जाते थे । वे हर तरह के कविता लिखते जो छोटे आकार के ज्यादा होते थे ।
वे मुझे सदैव छोटे भाई का दर्जा देते एवं जब भी मिलते तो यही कहते - ' और लीलाधर भाई , क्या हाल - चाल है ? ' लगभग साल भर तक मुझे उनका सान्निध्य मिला । एक ही स्टाफ में कार्य करने से मेरे प्रति उनका विशेष स्नेह था । स्कूल से छुट्टी के बाद शाम को उनके घर जाता तो पहले चाय - नाश्ता कराते , फिर अपनी कविता की डायरी या एलबम लेकर क्रम से प्रत्येक रचना को दिखाते और पढ़कर सुनाते जाते । बीच - बीच में भावार्थ भी समझाते और भाव में आकर गदगद हो जाते । समय कैसे बीतता , पता ही नही चलता । पोस्ट कार्ड या पत्र के द्वारा भी वे प्रकाशन हेतु अपनी कविता भेजते थे ।
आज से 22 - 23 वर्ष पहले हजार - बारह सौ की प्राइवेट नौकरी करना , खेती कार्य करना , पूरे परिवार की जिम्मेदारी वहन करना और कविता लेखन में डूबे रहना कोई साधारण बात नहीं है । मुझे लगता है उनका साहित्य प्रेम उनके हृदय व आत्मा की गहराई से प्रवाहित होती थी । वे भले नाम के फकीर थे किन्तु दिल और दिमाग से ऐसे अमीर थे जिसके खजाने में हीरे - मोती से भी ज्यादा मूल्यवान रत्न भरे हुए थे ।
आज वे इस दुनिया में नहीं हैं । लगभग दस वर्ष पहले हृदयाघात से उनका निधन हो गया । उनके परिवार में उनकी धर्मपत्नी , तीन पुत्रियाँ और एक पुत्र है । मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे ऐसे सहृदय , उदार , मानवतावादी व अखण्ड साहित्य प्रेमी व्यक्तित्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ । वे मेरे बड़े भाई तुल्य आदरणीय , मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत थे । आज भी मैं उनको हृदयपूर्वक श्रद्धा से याद करता हूँ । उनकी लेखनी व व्यक्तित्व को मेरा नमन है , प्रणाम है !
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