स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त
शीर्षक- *पुराने पन्ने*
अवचेतन मन में सँजोये मैंने
बीते कितने मीठे लम्हें,
अनायास कभी मनचली हवाऐं
पलटने लगते पुराने पन्ने,
चलने लगता स्मृति-पटल पर, यादों के चलचित्र जैसे..
वो माँ की गोद जैसे सर्दी मे रजाई,
ममता का आँचल सुख की छांव,
छोटे स्लेट पर क ख ग लिखना,फिर
बाबूजी का हौले से हाथ थामना,
भाई-बहन संग लालटेन में पढ़ाई
रोशनी के लिये होती लड़ाई।
अंतिम पन्नों में कुछ पहचाने नाम,
जाने कहाँ अब उनका ठांव,
दोस्तों के संग हँसी ठिठोली
गुम हो गये खेल डंडा गिल्ली,
स्कूल कॉलेज की सुनहरी यादें,
होती खास शिक्षकों की बातें ।
नानी का घर, गर्मी की छुट्टी
होती कितनी धमाचौकड़ी
मिलजुलकर चूल्हे में भोजन पकाना
बड़ी चटपटी सिलबट्टे की चटनी।
जीवन की आपाधापी में,
खोजती हूं वो पुराने पन्ने,
जानें कहाँ गुम हो गये,
जो थे कभी मेरे अपने,
अब ना लौटकर आयेंगे
दिन वो सुनहरे।।
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