स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- काविता
शीर्षक -"चिलमीलिका"
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चकमक-चकमक चिलमीलिका
रातों को रोशन कर जाते
रोशन खुद को करके
मुक्त गगन में उड़ जाते
हम भी काश इनकी तरह होते
स्वयं को रोशन कर पाते
नीले ,पीलेे, लाल रोशनी ले
धरती से गगन तक छा जाते
कभी घर के छज्जे पर आकर
मन मेरा हर्षित कर देते
बच्चों के हाथ उछले पकड़ने को
बूढ़ों को भी ललचाते
चकमक-चकमक चिलमीलिका
रातों को रोशन कर जाते
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