ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ (छत्तीसगढ़ )
विषय -मुक्त कविता (छत्तीसगढी
बोली मां )
शीर्षक-मयारू बेटी
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*मयारू बेटी*
अब्बड़ दिन के बाद, घर मा,
बेटी आये हे आज।
उखर किलकारी ले,
गुंजत हे हमर घर द्वार।
मोर मयारू बेटी,
सबो ल मया दीही।
सबके तोरा जतन करके,
अब्बड़ खुशी दीही।
मोर घर द्वार म,
होगे हावे अंजोर।
कई बछर ले कलपत रहेंव,
आज मिले हे संजोग।
तोर पैरी के बोली,
बाजे खोलिन खोल।
तोर मुलमुल हांसी बेटी,
मोर मन ल मोहे वो।
पढ़ लिख के बेटी,
तैं पाबे संस्कार वो।
दुनियाँ में नेकी करके,
करबे तैं उद्धार वो।
मोर दुलारिन बेटी,
मया ल राखबे तैं।
बुढ़त काल के सहारा रबें,
ऐसने चाहत हव मैं।
अब्बड़ मया के मोर मंयारू,
ते सब ल करबे पीरित वो।
सब संग मया बांट के,
झन करिबे काखरो संग रिस वो।
हिल मिल के रहिबे बेटी,
करबे सब के सेवा वो।
सब के मंया पा के बेटी,
करबे मया के गोट वो।
पांव में कांटा खुटी झन गडय,
बढ़त जाबे आगु वो।
दमकत रहे चेहरा तोर,
देवत हौ आसीष वो।
दाई,ददा के सेवा करबे,
भाई बहन के बनबे सहारा वो।
गांँव गोढ़ा के चहेती बन के,
सब ल करबे मया वो।
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उर्मिला सिदार
रायगढ़ छत्तीसगढ़
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