जिला एवं राज्य:-रायबरेली, उत्तर प्रदेश
शीर्षक:-जीवन का सफर
विधा:-छंदमुक्त कविता
मन का अपने कभी कर मैं पाया नही
अधीनता की जंजीरों में फंसा रह गया
सपने अपने कभी जी मैं पाया नही
दुविधा की जंजीरों में फंसा रह गया
मन करता रहा कि जिऊँ मैं स्वतन्त्र पर
जिम्मेदारी की जंजीरों में फंसा रह गया
अपने जीवन सफर में मिले कांटे बहुत
उन कांटो को हटाने में फंसा रह गया
खुशियों क्या है ये आती जाती रहीं
मैं दुःखों के समंदर में फंसा रह गया
जिससे उम्मीद थी साथ देगा मेरा
उसकी बेरुखी में मैं फंसा रह गया
जीवन को जीने की जद्दोजहद में
जीवन के भंवर में ही फंसा रह गया
मन का अपने कभी कर मैं पाया नही
अधीनता की जंजीरों में फंसा रह गया
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