जिला :- महासमुन्द
विषय :- लोक कला
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- अल्पना
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सुबह सबेरे उठकर मैया,
चूल्हा चौका सजाती है।
कार्तिक और अगहन मास में,
तड़के ही वह नहाती है।
सज सँवर कर भक्ति भाव में,
चावल कुछ भीगाती है।
भीगे अन्न सिल-बट्टे में पीसकर,
सुन्दर लेप बनाती है।
सुन्दर लेप से घर आँगन में,
अनुपम अल्पना बनाती है।
नेह भरा अल्पना आकर्षक,
उसमें उड़ेले भक्ति भाव।
विनती करती ईश्वर से नित,
घर में रहे प्रभु आशीष का छांव।
लोक कला की झलक मनोरम,
वर्षों से चल रही ये रीत।
ईश वंदन संग बाँटे मैया,
सारे जग में केवल प्रीत।
आकृतियों का सुन्दर सृजन,
है मैया की अद्भुत कल्पना।
श्वेत वर्ण में घर आँगन में,
सजे है सुंदर अल्पना।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने छत्तीसगढ़ की एक अनूठी लोक कला अल्पना जिसे की आंचलिक भाषा में झुटी कहा जाता है का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि मैया अक्सर ही घर आंगन को अल्पना से सजाती है।
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