Saturday, November 14, 2020

रायगढ़ से पुष्पा पटनायक कृत लघुकथा- तरसती आंखें

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- लघु-कथा
शीर्षक -"तरसती आंखें"
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दिवाली का बाजार सजा था ,रंग-बिरंगे पर्दों से  सजी- संवरी पटाखों,मिठाइयां ,रंगोली और इलेक्ट्रानिक सामानों की दुकानें देखते ही बन रही थी। मैंने लोगों की भीड़ में एक तरसती आंखों को देखा जो सब देख रही थी पर उसे कोई नहीं देख पा रहा था। इक्के -दुक्के की निगाहें पड़ भी जाती तो नजरअंदाज कर चलते बनते ।मैं थोड़ी देर देखती रही फिर धीरे से उसके पास गई उसे अपने थैले से थोड़े पटाखे और थोड़ी मिठाइयां दी।उन तरसती आंखों में खुशी की लहर का संचार हुआ । उसे और मुझे दोनों को सुकून मिला ।
क्या आप भी किसी तरसती आंखें और स्वयं को सुकून देना चाहेंगे...?

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