पेंडरवानी ,बालोद ,छत्तीसगढ़
विधा- कविता (मुक्त छंद )
शीर्षक -तब तुम मेरे पास आना प्रिये
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
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रूठकर तू गई , एक अरसा हुआ ,
रह गया मैं पानी,पानी बरसा हुआ ,
चली जाए मेरी इज्जत ,
मुस्कुराना प्रिये ,
छोड़ जाऊं जब दुनिया,
तुम आना प्रिये ,
तुझे उलझन सी थी ,
जब मेरा साथ था ,
हरपल अनबन सी रहती ,
हाथों में हाथ था ,
भूलकर मुझे ,
अपनी दुनिया बसाना प्रिये ,
गम का दौलत तुझे मेरे साथ था,
अब सदा यूं ही मुस्कुराना प्रिये ,
शौक था तुझे ,
दुनिया बदलने की अकेले ,
जहां की हर सुख ,
तुझे हर राहों में मिले ,
पाके मंजिल अपना ,
झूमना , इतराना प्रिये ,
उसके सुख - दुःख को भी ,
अपनाना प्रिये ,
दुनिया की ठोकर ,
अगर मिल जाये ,
जिन्हें अपना समझो ,
वो दिल तोड़ जाए ,
याद आ जाऊं तुमको तो -
फिर आजमाना प्रिये ,
मैं रहूँ न रहूँ पर तेरा ही रहूँगा ,
तुम मेरे पास तब आ जाना प्रिये ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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