स्थान- दुर्ग छ.ग.
विधा - मुक्त
शीर्षक-
*ओस की बूंद-एक छलावा*
गर्म लिबास पहने
प्रकृति को निहारती,
हर चाय की चुस्की
कुछ याद है दिलाती,
सर्द मौसम की यह
कंपकपाती भोर,
चल रही शिशिर की
पवन मंद-मंद,
कोहरे से ढँका आसमान
अदृश्य हो जैसे हर छोर,
सूर्य की स्वर्णिम किरणें
ऊँचे दरख्तों से झांकती,
तरुवर की शोभा बढाती,
फूलों की पंखुड़ियों पर
मोती सी चमकती ओस की बूंद,
पुष्प भी आनंदित है इनका
साथ पाकर,
पर ये क्या ..रवि किरणें जो
पंखुड़ी पर पड़ी,
दूर गगन में वह उड़ चली कुछ पल साथ देकर ही,
लगे जैसे हो छलावा कोई ।
शायद तुम यूं ही आये थे
मेरी जिंदगी में...
जीवन की मध्यान्ह बेला
और
तेज तपिश में चल दिये
साथ छोड़कर,
अब आओ तो अंतिम पड़ाव तक ठहर ही जाना,
धुंध हटाकर सुनहरी सुखभरी
उजास तुम लाना,
सपने देखती रहती हूं इन पलकों को मूँद,
पर अब ना आना तुम बनकर ओस की बूंद ।।
बहुत सुंदर
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