Monday, October 19, 2020

संतराम कुम्हार की रचना- ओस की बूँद

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
     विधा - छंदमुक्त कविता 
   शीर्षक - " ओस की बूँद "
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मोती-सी लगती ओस की बूँदे, 
मन को बहुत भाती है। 
सूर्य किरणें से आलिंगन कर,
और भी चमक जाती है।। 

धान की बाली का श्रृंगार बनती, 
सुन्दरता उसकी बढ़ाती है। 
हरीतिमा लिए फसल को,
हीरे के टुकड़ों से सजाती है।। 

हवा का झरोखा जब इस पर पड़ता, 
बिखर-सी ये जाती है। 
मानो मोती से बंधी माला, 
टूटकर अलग हो जाती है।। 

फूलों पर ये ओस की बूँदे, 
चार चाँद उसमें लगाती है।
गंगा-सा पवित्र ये जल भी, 
पुष्प-संग प्रभु चरण धो जाती है।। 

सुबह-सुबह ये प्यारी बूँदें,
ताजगी का अहसास कराती है। 
नेक काम में भागीदार बनती, 
परिंदों की प्यास बुझाती है।।

कार्तिक पूर्णिमा की महिमा निराली, 
जो हमें सुनायी जाती है।
चंद्र प्रकाश में रखा खीर भी, 
ओस से अमृत का स्थान पाती है।। 

क्षणभंगुर हमारा जीवन भी, 
ओस-सी चमकती फिर गायब हो  जाती है। 
कुछ पल जीओ, पवित्रता से जीओ, 
संदेशा ये दे जाती है।। 

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मौलिक रचना (स्वरचित) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

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