जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - निबंध
शीर्षक - " स्कूली पाठ्यक्रम में पत्र लेखन का समावेश "
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वर्तमान समय में विज्ञान ने संदेश पहुँचाने के अनेक साधनों का अविष्कार भले ही कर लिया हो लेकिन पत्र लेखन की जो महत्व है ओ हमेशा रहेगी। पत्र लेखन विशेष रुप से कलात्मक शैली है अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति करने की। पत्र लेखन की सहायता से हम अपनी मन की भावनाओं को भावों के साथ दूसरों तक पहुँचा सकते हैं।
सभी स्कूली छात्रों को पत्र लेखन आना ही चाहिए। पत्र लेखन की जो शैली है उसमें पारंगत होनी चाहिए ताकि जब भी उन्हें पत्र लिखने की जरुरत पढ़े तो ओ बिना कोई हिचकिचाहट और परेशानी के अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करने में सफल हो। पत्र लेखन की जरूरत हमें जीवन भर पड़ती है। चाहे स्कूल समय में छुट्टी के लिए आवेदन पत्र लिखना हो या बड़े होने पर आॅफिस में कोई पत्र लिखना हो या सरकारी कार्यालयों में अपनी दैनिक जीवन के कामकाजों के लिए ही पत्र लिखना हो। इसलिए स्कूली पाठ्यक्रम में पत्र लेखन का समावेश किया जाना ही चाहिए ताकि पत्र लेखन को बचपन से ही अपने व्यवहार में ला सकें।
लेकिन अभी के समय में पत्र लेखन सिर्फ परीक्षा तक ही सिमट कर रह गयी है।व्यक्ति परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए ही पत्र लेखन को जानना चाहता है फिर भूल जाता है। उसे अपने व्यवहार में शामिल नहीं करता है।
अभी के समय में संदेश डिजिटल संदेश साधनों ई-मेल, वाट्स-अप, आदि इंटरनेट के साधनों में बंध गई है। हांलाकि के त्वरित साधन हैं संदेश के लेकिन पत्र लेखन का जो सम्मानजनक स्थान जो साहित्यकारों ने दी है उसकी जगह कोई नहीं ले सकता।
अतः अंत में मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि स्कूली पाठ्यक्रम में पत्र लेखन का समावेश अनिवार्य रुप से हो ताकि पत्र लेखन में विद्यार्थी बचपन से कौशल हो। उसे अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति आनी चाहिए तभी वह समाज में एक शिक्षक नागरिक कहला सकता है। पत्र लेखन की कला से व्यक्ति अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है। उसका प्रभाव भी मन की गहराई तक जाती है।
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मौलिक रचना (स्वरचित)
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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