Wednesday, October 14, 2020

गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" की रचना- धरोहर


 रचनाकार- गुलशन खम्हारी"प्रद्युम्न"

जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

विषय- प्राचीन धरोहरों पर केंद्रित रचना

विधा - कविता

शीर्षक- धरोहर

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खंडहरों में दफ्न आज इतिहास है,

जर्जरता है पहचान मानवता पर अट्टहास है ।

विलासिता के दिवास्वप्न में,

आज फिर ऊॅंचे इमारतों का शिलान्यास है ।।


महरौली का लौह स्तंभ अब भी जवान दिखता है,

अजंता एलोरा की गुफा भी ऐश्वर्यवान दिखता है ।

दारुण व्यथा यह मूक-बधिर पत्थर कैसे कहें?

यहाॅं सच की दुकान में झूठ ही बिकता है ।।


आक्रांताओं ने यहाॅं मातमी विध्वंस किया था,

निज ज्ञान बगुले को यहाॅं राजहंस किया था ।

लहू से सींचे हैं इन धरोहरों के ईंट,

हत्यारों ने यहाॅं हत्या भी तो नृशंस किया था ।।


वेद पुराण ग्रंथ सब यूॅं ही जलाए गए थे,

नमक संग मिर्च से घाव सहलाए गए थे ।

शिकारी अपनी जाल बिछाता गया,

और हम तीतर बटेर सा इसमें बहलाए गए थे ।।


पुरातत्व थातियों में अनगिनत किस्से मिलेंगे,

गौरव-मान-मर्यादा के भी हमारे हिस्से मिलेंगे ।

हमेशा खंजर पीठ पर ही भोंका गया,

देखो कभी खून से लथपथ भी भरोसे मिलेंगे ।।


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स्वरचित मौलिक रचना-

गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"

रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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