सुंदरगढ़ ,ओडिशा
विधा-मुक्त काव्य
विषय-ओस की बूंद
शीर्षक-ओस की बूंद सी जिंदगी
ओस की बूंद सपनों सी होती है
सुबह होते ही छिप जाती है
शाम होते ही अपने होने का
एहसास मन में जगाती है
ओस की बूंद की शीतलता
जो तन-मन को सराबोर करें
पिया मिलन की बेला में
जो जीवन में मधुरता भरे
ओस की बूंद से रिश्ते
जरा गलतफहमी से टूट जाते हैं
ज्यों धूप उड़ा ले जाती ओस को
साथ पलभर में छूट जाते हैं
ओस की बूंद सी जिंदगी
जाने कब उड़ जाएगी
अपनो को अपनेपन से बांध लो
ना जाने कब साथ छोड़ जाएगी?
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