विधा _ गीत
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
शीर्षक _माँ
दिव्य प्रेम पावन आँचल में
भरकर फिर तुम आ जाओ |
★★★
स्वर्ग मिला जिस पुण्य चरण में,
माँ अब दरश दिखा जाओ |
दिव्य प्रेम पावन आँचल में,
भरकर फिर तुम आ जाओ |
//1//
चैन नही मिलता जब मन को
याद तुम्हारी आती है |
तेरा जो निःस्वार्थ प्रेम है,
मेरे मन को भाती है|
उसी प्रेम की परिभाषा को,
तुम्ही मुझे सीखा जाओ
दिव्य प्रेम पावन आँचल में,
भरकर फिर तुम आ जाओ |
//2//
बिना कहे चेहरा पढ़ लेती |
पीर समझ सब जाती हो |
मेरा सब कुछ सदा जानकर |
मुझको गले लगाती हो |
कृपा करो माँ मेरे मन से,
सारे पीर मिटा जाओ।
दिव्य प्रेम पावन आँचल में
भरकर फिर तुम आ जाओ |
//3//
सारा जग भी साथ छोड़ दे,
नहीं किसी का साथ रहे |
लेकिन मेरे इस सिर पर माँ,
तेरे पावन हाथ रहे |
सदा करूँ सम्मान तेरा मैं,
वह मनभाव जगा जाओ।
दिव्य प्रेम पावन आँचल में,
भरकर फिर तुम आ जाओ
//4//
भीड़ दिखे जब-जब दुनिया की,
तब-तब मुझको याद रहे।
भरे हौसला मेरे मन वह,
तेरा आशीर्वाद रहे।
मेरे भी मन मे आशा की,
दीपक एक जला जाओ।
दिव्य प्रेम पावन आँचल में
भरकर फिर तुम आ जाओ |
//5//
कर्ज नहीं चुकता कर सकती ,
माँ तेरे उपकारों का|
सदा बताया मंत्र तुम्ही ने,
नाव फँसी मझधारों का।
फँसी आज मैं बीच भँवर में,
नइया पार लगा जाओ।
दिव्य प्रेम पावन आँचल में,
भरकर फिर तुम आ जाओ |
★★★
रचनाकार _ सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
Friday, October 16, 2020
बिलासपुर से सावित्री यादव "सावि" की रचना- माँ
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