जंगल जल रहे
जल रहे हैं जंगल
हरे पेड़ों की आत्माएँ
चीत्कार कर रहीं हैं
मानव की भाँति
हमे बचा लो
नहीं देखी जाती
उनकी व्यथा
पत्तियों का जल कर बिखरना
टहनियों का चिटक गिरना।
वस्त्र और अस्थियों की तरह।
असामयिक मृत्यु
कष्टकारी तो होती है ना
भटकेंगी उनकी भी आत्माएँ
नहीं होने देंगी अग्रिम विकास
कितनी वृच्छ समाधियाँ बनेगी
जीव जन्तु मूक पशु सभी
हवन हो रहे अपने प्राकृतिक
घरौदों के साथ अस्तित्व खो रहे
जाने कौन कौन सी प्रजातियाँ
धरा से उठ ही ना जायें।
रोको कोई रोको ये विनाश
धरती को शून्य किये जाने का
ये संदेश बन्द करो।
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