Tuesday, October 13, 2020

उत्तरप्रदेश से माधवी मिश्रा की रचना- जंगल

माधवी मिश्रा
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
 विधा-मुक्त
शीर्षक -जंगल जल रहे है

जंगल जल रहे

जल रहे हैं जंगल
हरे पेड़ों की आत्माएँ  
चीत्कार कर रहीं हैं 
मानव की भाँति 
हमे बचा लो
नहीं देखी जाती 
उनकी व्यथा 
पत्तियों का जल कर बिखरना
टहनियों का चिटक गिरना। 
वस्त्र और अस्थियों की तरह।
असामयिक मृत्यु 
कष्टकारी तो होती है ना
भटकेंगी उनकी भी आत्माएँ
नहीं होने देंगी अग्रिम विकास
कितनी वृच्छ समाधियाँ बनेगी
जीव जन्तु मूक पशु सभी
हवन  हो रहे अपने प्राकृतिक
घरौदों के साथ अस्तित्व खो रहे
जाने कौन कौन सी प्रजातियाँ 
धरा से उठ ही ना जायें।
रोको कोई रोको ये विनाश 
धरती को शून्य  किये जाने का 
ये संदेश बन्द करो।


No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...