रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवासी-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
जिला-रायपुर ।
शीर्षक-""चिड़िया का घोंसला """
विधा--^^आलेख ^^ ।
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==||<<•चिड़िया का घोंसला •>>||==
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प्रकृति की गोद में जीव-जन्तु और वनस्पतियों का बसेरा है ।पृथ्वी का उदभव और विकास की यात्रा बहुत ही अदभुत व आश्चर्यचकित करने वाली है ।इसमें प्राकृतिक क्रिया-कलापों का असीम योगदान है ।पृथ्वी का भूस्थलीय भाग 27% व जलीय भाग लगभग 73% है ।विश्व के सम्पूर्ण पर्यावास में भौगोलिक संरचनाओं के आधार पर प्रकृति का स्वरूप अलग अलग है और सभी क्षेत्रों की जलवायु में भी परिवर्तन भिन्न भिन्न है ।इसी कारण से जीव-जन्तु व वनस्पतियाँ की उत्पत्ति भी जीवन निर्वाह सिध्दांतों के अनुसार होता है ।इसी कारण से अभी तक बहुत से जीवों व वनस्पतियों की प्रजाति समय काल के अनुसार विलुप्त हो चुकी हैं ।अतः मैं इस आलेख के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि पक्षी वर्ग समूहों में अनेक प्रकार के पक्षी आते हैं ।जिन्हें जीने के लिए प्रकृति की संरचना व मौसमों के अनुरुप ढलना,बढ़ना और पलना पड़ता है ।तभी वे वहाँ की परिस्थितियों के साथ जिन्दा रह पाते हैं ।इसी कारण से उनकी शारीरिक बनावट भी उसी तरह से होती है ।जैसे:-पेंग्विन बर्फीले पानी वाले स्थलो पर निवास करते हैं और ठीक इसके विपरीत शुतुरमुर्ग ,बाज आदि गर्मी वाले स्थानों में ज्यादा पायी जाती है ।कुछ चिड़िया बहुत छोटी तो कुछ चिड़िया बहुत बड़ी आकार की होती हैं ।कुछ उड़ सकतीं हैं और कुछ जमीन पर ही चल सकतीं हैं ।कुछ-कुछ दोनों तरह से अपनी जीवन शैली का निर्वहन करते हैं ।
आओ हम विभिन्न प्रकार के क्षेत्रों में निवास कर रहे ,चिड़ियों के बारे में संक्षिप्त में उनके बारे में जानें ।हम अपने देश भारत की ही बात करते हैं कि हिमालय पर्वत श्रृंखला का क्षेत्र,यहाँ बर्फ़ होने व अधिकतर समय ठंडा वातावरण रहता है ।वहाँ पर निवासरत चिड़िया कुछ जमीन के भीतर व कुछ पेड़-झाड़ियों में भी अपना घोंसला बनाकर रहते हैं ।किंतु सर्द हवा व बर्फ़ से बचने के लिए उनके शरीर की बनावट भी वैसे ही रहती है ।रेगिस्तानी इलाकों में चिड़िया पत्थरों के बीच,जमीन पर सुरक्षित जगह पर बनाती हैं ।कुछ छोट -सी तो कुछ बहुत बड़ी आकारों की होती हैं और उड़ भी नहीं सकतीं हैं ।इन इलाकों में सबसे चालाक चिड़िया बाज है और उसके बाद गिद्ध होते हैं ।एक चिड़िया चील भी होती है ।ये या तो पेड़ों पर या पर्वतों की गोद में,चट्टानों के खोह में अपना घोंसला बनाकर रहते हैं ।ये माँसाहारी होते हैं किन्तु गिद्ध मरे जीवों के माँस का भक्षण करता है ।किन्तु बाज जीवित जीवों पर झपटा मारकर अपना शिकार बना,भोजन करता है ।मध्य व पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली चिड़िया बहुत मात्रा में पायी जाती हैं ।वे बहुत ही सुन्दर और मनमोहक होती हैं ।उनकी चोंच,पर बहुत खूबसूरत होते हैं ।किन्तु पाँव मटमैले ,भूरे रंग के लिए होते हैं ।जिसमें मोर,मिठ्ठू व जंगली मुर्गी आदि ।मिठ्ठू अपना घोंसला पेड़ों की शाखाओं के खोखले भाग या सूखी डाली में छेद बनाकर रहता है अर्थात् में कोटर के अन्दर रहते हैं ।वहीं मोर व जंगली मुर्गी जमीन पर घास-पूस,पत्तियों के ढेरों में छुपा कर अंडे देने के समय बनाते हैं,नहीं तो वैसे ही सुरक्षित जगहों में पेड़ों पर बैठकर जीवन गुजार देते हैं ।
मैं तुम्हें कुछ ऐसी चिड़ियो के बारे में बताना चाहता हूँ कि वे दूसरों के घोसले में अपने अण्डे देती है और उनके अंडो को वह पक्षी सेता है और बच्चे भी निकालता है ।मजे की बात यह है कि जब चूजों को लगे पंख और बोलने लगते हैं,तब वह पक्षी उनमें भेद कर पाता है ।अब तो आप जान ही गये होंगे कि मैं किस चिड़िया की बात कर रहा था-?चलो आपकी जिज्ञासा का समाधान कर ही देता हूँ,उसका नाम है 'कोयल 'और दूसरे का 'कौआ 'है ।वैसे प्रकृति में अनेकानेक चिड़िया पाई जाती है,उनमें से एक 'पहाड़ी मैना ' जो कि बस्तर की पहाड़ियों में पाई जाती है और आज विलुप्त होने के कगार पर है किन्तु शासन इनके संरक्षण के लिए भरसक प्रयास कर रही है ।इनके घोंसले पेड़ों की डाली पर होते हैं ।
तुम्हे कुछ घरेलू चिड़ियो के बारे बताना चाहता हूँ कि वे मिट्टी के मकानों व गौशाला के छप्परों में या घर के पास घने पौधे व झाड़ी पर अपना घोंसला बनाकर रहते हैं ।ये अपना घोंसला बनाने के लिए घास -पूस,पैरा,कपड़ों के रेशे,सुतली आदि के रेशों से बनाते हैं ।चूँकि ये मानव बसाहट के नजदीक ही रहते हैं इसी कारण से इन्हें घरेलू चिड़ियाँ कहते हैं ।इन्हें आसानी से खाने के लिए दाना व भोजन मिल जाता है ।फिर एक ऐसी चिड़ियाँ के बारे में बताना चाहता हूँ कि जो पेड़ों की पतली डाली के अन्तिम छोर पर या कटीली पेड़ों की पत्तियों के छोर पर अपना घोंसला बनाकर रहते हैं ।इनके घोंसले घास व पत्तियों के रेशों से वे तैयार करते हैं,जिनके लिए वे गन्ने,नारियल,मक्के,ज्वार आदि के पत्तों का उपयोग करते हैं ।इस चिड़िया का नाम 'बया ' है और कुछ लोग इसे दर्जी चिड़ियाँ भी कहते हैं ।
अन्त में यह कहना चाहता हूँ कि 'चिड़ियाँ का घोंसला ' पक्षियों का बसेरा है और रात गुजारने का ठौर भी होता है और जीवन सृजन का मुकाम भी होता है ।पक्षी अपनी सुरक्षा के हिसाब से बड़ी चतुराई से अपना घोंसला बनाकर रहते हैं ।
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संदेश:--मानव जाति के लिए 'चिड़िया का घोंसला ' एक संदेश भी बन सकता है कि हमें अपने जीवन को बचाने के लिए एक सुरक्षित नीड की जरूरत होती है ।जैसे पक्षी जोड़े से रहकर अपना घोंसला बनाकर जीवन साथ साथ गुजारते हैं ।हमें भी साथ साथ रहने के लिए और समूह में संगठित रहने की सीख देते हैं ।
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