संबलपुर, कांकेर,(छ .ग.)
शीर्षक- *अस्तित्व*
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~ @ *अस्तित्व* @ ~
नारी हूँ मैं अबला नहीं
सबला बन दिखलाऊँगी
कोमल हूँ कमजोर नहीं
अपना अस्तित्व बचाऊंगी।
पुरुष प्रधान समाज ने
मुझे सदियों से अलग रखा,
हर क्षेत्र में अलग कर
नवीनता का परचम फहराऊंगी।
चाह नहीं है साम्राज्ञी या
देवी बन मैं इतराऊं,
जो हूँ, जैसी हूँ, नारी की
अलग पहचान बनाऊँगी।
लोकलाज,मर्यादा,विनम्र
होना सिखलाया गया,
मर्यादाओं में रहकर अपनी
प्रबल आवाज सुना जाऊँगी।
युग बदले,जग बदले
मेरी कीमत कर न पाओगे,
मेरे कोख में नवांकुर फूटेंगे,
सृष्टि दात्री जग जननी
मैं ही कहलाऊंगी।
चाहे कितनी विपदा आएं,
काँटों भरे मंच पर ही
बुलंदियों का झंडा गाड़
अस्तित्व को बचाऊंगी।
नारी हूँ अबला नहीं
सबला बन दिखलाऊँगी,
कोमल हूँ कमजोर नहीं
अपना अस्तित्व बचाऊंगी।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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