जिला :- महासमुन्द
शीर्षक :- बिगड़ा हुआ जमाना है।
विधा :- तांटक छंद
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चल ज्वाला बनकर वो बेटी, बिगड़ा हुआ जमाना है।
कमजोर नहीं, ना अबला है, डटकर सबक सिखाना है।
रण चंडी बन चामुण्डी बन, निज भुजबल दिखलाना है।
दुर्गा भी है काली तू ही, डरना नहीं डराना है।
चल ज्वाला बनकर वो बेटी, बिगड़ा हुआ जमाना है।
कमजोर नहीं, ना अबला है, डटकर सबक सिखाना है।
जब छेड़े कोई आवारा, चाँटा उसे लगा देना।
तू फूल है व अंगारा भी, बात उसे समझा देना।
चल ज्वाला बनकर वो बेटी, बिगड़ा हुआ जमाना है।
कमजोर नहीं, ना अबला है, डटकर सबक सिखाना है।
जब बन भेड़िया तुमको कभी, जालिम बन वे नोचेंगे।
ऐसा सबक सिखाना उनको, बार - बार फिर सोचेंगे।
चल ज्वाला बनकर वो बेटी, बिगड़ा हुआ जमाना है।
कमजोर नहीं, ना अबला है, डटकर सबक सिखाना है।
बार - बार फिर सोचेंगे यह, फिर ना हाथ लगाना है।
मृग नहीं तू शेरनी वन की, बात उसे समझाना है।
चल ज्वाला बनकर वो बेटी, बिगड़ा हुआ जमाना है।
कमजोर नहीं, ना अबला है, डटकर सबक सिखाना है।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने देश की बेटियों के साथ हो रहे क्रूरता को देखते हुए बेटियों को खुद से मजबूत होने व उनके साथ होने वाले अन्याय से लड़ने के लिए आव्हान किया है।
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