निवासी:-बैरन-बाज़ार,रायपुर ।
जिला:-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विधा-आलेख ।
शीर्षक:-"अहिंसा और गांधी दर्शन "
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○||•"अहिंसा और गांधी दर्शन"||•○
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महात्मा गाँधी एक युगपुरूष हैं ।उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने एवं सम्पन्न परिवार के थे ।फिर भी उस समय अंग्रजों के अधीन गुलामी में जकड़ी हुई थी ।इन हालतों को देखते हुए उनके मन में भी देश को आजादी दिलाने के लिए वे भी इस समर में भागीदार बन गये ।
उन्होंनें अंग्रजों के खिलाफ कई प्रकार के आन्दोलन किया ।उनमें से कुछ के नाम आपके सामने रख रहा हूँ--असहयोग आंदोलन,सत्याग्रह,आमरण अनशन,भारत छोड़ो आन्दोलन आदि किया ।इनमें से उनका विरोध का सशक्त हथियार "सत्य-अहिंसा "को अपनाया था ।अंग्रजों के साथ कई मुद्दों पर वार्ता हुई और कुछ उनके पक्ष रहे व कुछ पर सहमति नहीं बन सकी ।उनकी सादगी,सद्गुणों के साथ देश की जनता,उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर एक साथ चल रही थी ।उनका स्वराज्य आन्दोलन अहिंसक था ।वे नरम दल के समर्थक थे,इसी कारण उनके अनुयायी सभी उम्र वर्ग के अत्यधिक लोग उनके साथ थे ।जबकि कुछ लोग गरम दल के साथ भी खड़े थे ।
उनकी जीवन शैली में शाकाहारी भोजन के पक्षधर थे और मांस-मदिरा के सक्त खिलाफ थे ।उनके इस दर्शन में सादगी थी,जिसका समर्थन लोगों ने दिल खोलकर किया ।वे प्रतिदिन प्रात:भजन-कीर्तन और गीता का पाठ किया करते थे ।जिसके कारण उन्हें आत्मिक शक्ति मिलती थी ।इसी कारण से वे भारत को आजादी दिलाने के लिए अहिंसा की राह चुनी और अन्ततः आजादी मिलकर ही रही ।
इनके जीवन दर्शन से जनता पर ऐसा प्रभाव आया कि सत्यता के साथ हम,अहिंसा को अपनाकर,अपने हक की लड़ाई लड़ सकते हैं ।साथ ही धैर्यता रखकर बड़ी सी बड़ी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं ।आज के परिवेश में हमारे जनप्रतिनिधि गाँधी दर्शन की बात तो करता है,पर स्वयं उनकी बात को व्यक्तिगत रूप से अपने व्यवहार में नहीं दिखा पाते हैं ।
गांधीजी ग्राम सुधार व रामराज्य की कल्पना करते थे,किन्तु वो परिदृश्य आज वैसा देखने को नहीं मिलता ।
अन्त में यही कहूँगा कि बापूजी की आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो उनके बताये गये आदर्शों पर चलना होगा और आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार करना होगा ।भ्रष्टाचार,कालाबाजारी व बेईमानी कैसे दूर हो पायेगी ।तब ही देश को मिली आज़ादी का मतलब सही अर्थों में लोकतंत्र के सामने आ सकेगा ।
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