Friday, October 16, 2020

दुर्ग से अनुरमा शुक्ला की रचना- माँ

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त
शीर्षक- मेरी माँ

*मेरी माँ*
कुछ अपने लिये भी जी लो...

प्यार, दुलार, कभी मनुहार
मीठा-मीठा माँ का लाड़,
स्पर्श जादुई, ममताभरी,
कई रुप जी लेती नारी,
माँ रुप है सब पर भारी
हर रिश्ते वह बखूबी निभाती
जाने कितने दर्द सह जाती ।

    मेरी माँ है सबसे न्यारी,
    दुनिया भर में सबसे प्यारी,
    मासिक पीड़ा हो या
    असहनीय प्रसव पीड़ा,          
    कितनी मानसिक यातनाएं
    सहते रही चुपचाप,
    हमेशा सबसे छुपाती,
    सदा मुस्कुराती,
    छोटी-छोटी तकलीफें,
    बातों-बातों में भूला देती,
    और सीने से हमें लगाये,
    बस प्यार लुटाया करती,
भोर की पहली किरण संग
काम की शुरुआत कर लेती,   
  दिन ढले थककर             
   कुम्हला सी जाती,
कितनी जीवटता से हर पीड़ा  
   तुम सहज सहती गई
जाने कहाँ से लाती थी तुम
  वह अपार शक्ति,
मौन रहने की, सहने की,श्रम
  कठोर करने की ।

उम्र के इस पड़ाव में लगता है      
क्या होने लगी हूं मैं भी तुम सी....
शायद हर औरत सोचती
  यही उम्रभर ,
जी लूं कुछ वक्त अपने
  लिये भी,
ऐसा कहाँ होता है.. जब
  तुम्हें देखती हूं,
इन्तजार में दिन काटती हो,                                  
   हमारे आने की खुशी में कितने पकवान सजा देती हो,
  जाने क्या सोचती रहती हो हर पल,
  पर कहती हो कभी ना,
देखते रहती हूं तुम्हारी माथे पर चिंता की लकीरें,
कितनी भोली लगती हो तुम माँ ।

पास बैठों हमारे कभी,
कहो ना मन की बात,
  लगी रहती हो काम में तुम    
     दिन-रात,
माँ कुछ अपने लिये भी तो   
  जी लो ना,
क्या खाओगी, क्या पहनोगी          
  कहाँ है तुम्हें घूमने जाना,
बैठ जाओ कभी आराम से,     
   काम सारे हमें कह दो,
तुम बस बैठकर गप्पें हाँको ,
कितना सुखद एहसास वह  
   होगा,
कुछ बात तो मन मे होगी,
तुम हमसे साझा कर लो,
माँ अपनी मनमानी कर लो
कुछ अपने लिये भी जी लो
कुछ अपने लिये भी जी लो ।।


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