Friday, October 16, 2020

सुन्दरगढ़ से मोनालिसा बेहरा की रचना- माँ

रचियता-मोनालिसा बेहरा
सुंदरगढ़(ओडिशा)
विधा-मुक्त छंद कविता
विषय-"माँ"

माँ तेरे आँचल की छांव
जब-जब झुकती हूं, छूने को तुम्हारे पांव
मेरी जन्नत है वहीं, तू रहती है जिस गांव
कन्यादान कर मेरा,मैं जानती हूं
तू कितना रोई थी
न जाने कितनी रातें
तू तकिया भिगोई थी
छोड़ के तेरा आंगन
एक पल भी तुझे कहाँ
मैं भूल पाई थी।

माँ मैं तो तो तेरी परछाई हूं
तुझमें ही  तो समाई हूं
तेरा ही प्रतिबिंब हूं
तुझसे कहाँ मैं भिन्न हूं
तेरे संस्कारों में ही रची बसी मैं
आज एक माँ होकर भी
तुझमें सहारा ढूढ़ती हूं।

माँ पापा का असमय छोड़  जाना
अपने ही बनाये दायरे में
तुम्हारा सिमट जाना
हजार कोशिशों के बाद भी
तुम्हारा दुख कहाँ बाँट पाई हूं
माँ क्या मैं बिटिया पराई हूं?
मैं तो माँ तेरी ही परछाई हूं।


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