जिला - बलौदाबाजार ( छ. ग.)
विषय - मोह
विधा - छंद मुक्त के कविता
अलंकार - तद्गुण अलंकार
शीर्षक - मोह की महिमा
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// मोह की महिमा //
मोह का बंधन विनाशक ,
उल्टा भ्रामक ज्ञान ।
सारी अविद्या का यह मूल ,
करते बहुत नुकसान ।।
स्वार्थ - अपेक्षाओं से भरा ,
मोह मन का विकार है ।
त्याग - प्रेम से कोसों दूर ,
रूप - रंग इसके हजार हैं ।।
मोह प्रेम का रूप बनाकर ,
लोगों से करते व्यवहार ।
नकली प्रेम का असली प्रेम ,
ठग लेते पूरा संसार ।।
त्याग समर्पण औरों का हित ,
व्यापक होते प्रेम ।
सृष्टि के कण - कण में समाहित ,
शुद्ध प्रेम का नेम ।।
किन्तु मोह है गंदा कुआँ ,
सड़ा हुआ दूषित पानी ।
सुख - सुविधा और शरीर तक ,
सीमित मोह - कहानी ।।
पुत्र - मोह धृतराष्ट्र का ,
महाभारत युद्ध कराये ।
भाई - भाई का प्रेम अवध में ,
त्याग धर्म सिखलाये ।।
बच्चों के प्रति ज्यादा मोह ,
पंगु उसे बनाता है ।
आगे चलकर जीवन उसका ,
अविकसित रह जाता है ।।
मोह नाली का कीचड़ है ,
दुर्गन्ध युक्त दलदल ।
हाथी जैसा प्राणी भी ,
होते निकलने में विफल ।।
मोह - नशा मादक है भारी ,
सबको करे बेहोश ।
आधि - व्याधि दुःख - चिंतायें ,
पलते इसकी कोख ।।
मोह की महिमा अपरम्पार ,
सब कोई चक्कर खाये ।
ज्ञान - प्रेम से प्रभु को भजते ,
केवल वही बच पाये ।।
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तद्गुण अलंकार का प्रयोग -
1. मोह प्रेम का रूप बनाकर...
2. किन्तु मोह है गंदा कुआँ...
3. मोह नाली का कीचड़ है...
4. मोह नशा मादक है भारी ...
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