जिला - महासमुंद
राज्य - ( छ.ग.)
विषय - "मन का रावण "दोहे
विधा -- दोहा
रावण , रावण सब कहे,
राम कहे ना कोय ।
अंतस राम-राम रटे,
तो रावण ना होय।।
दूषित मावष मन सदा ,
भरे इंद्रिय विकार।
राग ,द्वेष जन पाप से ,
कलुषित हो संसार ।।
मुख में राम धरे हुए ,
मन को रावण भात।
माया रस के पान से ,
राम - नाम मिट जात।।
रावण सम ज्ञानी फिरे,
माया होत लचार ।
धर्म- कर्म कुल भ्रष्ट करे,
नष्ट किये परिवार।।
राजा पल में रंक हो ,
करे राम प्रतिकार।
शक्ति, शान सब छिन्न हुए,
जमीन गये पछाड़ ।।
राम नाम का सुध करें,
हो लालच संहार ।
देह भान छूटे सभी ,
मन का रावण हार।।
पुष्पा गजपाल "पीहू "
महासमुंद (छ. ग.)
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