Tuesday, October 27, 2020

महासमुंद से पुष्पा गजपाल पीहू की रचना- मन का रावण

नाम - पुष्पा गजपाल पीहू
जिला - महासमुंद
राज्य - ( छ.ग.)
विषय  - "मन का रावण "दोहे
विधा  -- दोहा

रावण , रावण  सब  कहे,
         राम  कहे  ना कोय ।
अंतस  राम-राम  रटे,
         तो  रावण  ना  होय।।

दूषित मावष  मन सदा , 
      भरे   इंद्रिय   विकार।
राग ,द्वेष जन पाप से ,
      कलुषित   हो   संसार ।।

मुख   में  राम  धरे  हुए , 
      मन  को  रावण भात।
माया  रस  के  पान  से , 
      राम - नाम मिट जात।।

रावण सम ज्ञानी फिरे, 
      माया  होत लचार ।
धर्म- कर्म  कुल भ्रष्ट करे,
      नष्ट  किये   परिवार।।

राजा  पल  में  रंक हो , 
      करे  राम   प्रतिकार।
शक्ति, शान सब छिन्न हुए,
      जमीन  गये पछाड़ ।।

राम नाम का सुध करें,
     हो   लालच   संहार ।
देह   भान  छूटे  सभी ,
     मन  का  रावण  हार।।

पुष्पा गजपाल "पीहू "
महासमुंद (छ. ग.)

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