स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"भाव "
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मन के उपजे भाव
खेले जग में दांव
जिसकी जैसी भावना
उत - उत चलते पाँव
भाव के भूखे सब होते
देव हो चाहे दानव
भाव में सभी बह जाते
भूत हो चाहे मानव
भाव से ही भक्ति मिले
भक्ति से मिलते देव
भक्त हो जाते महान
भाव से इतनी शक्ति मिले
भाव के हैं अनेक रूप
सखा भाव जैसे सुदामा
प्रेमभाव हो राधा का या
अनुसुइया को देव पुत्र मिले।
सोना नहीं चांदी नहीं
ना पद और पैसा
भाव जहां अच्छे मिले
तो मन से मन खिले
भाव अच्छे रख कर
भवसागर को पार करें
वर्ना भाव बुरें हो तो
मृत को भी मुक्ति ना मिले ।
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