स्थान- दुर्ग छ.ग.
विधा- मुक्त
शीर्षक-
*कविता का जन्म,कागज पर*
नीति,अनीति के भँवर में जब,
फँसता जाता है मानव मन,
बँधे मन के तरकश से तब,
शब्द बाण बन निकलता है।।
हो अन्याय निरीह पर जब,
एक तड़प सी मन में जगती है,
उठती आक्रोश की ज्वाला तब,
लेखनी विद्रोह की पंक्ति रचती है।
भ्रष्टाचार की आँधी जब,
वर्दी की ईमान ढहाती है,
दंभ दिखाता मानुष तब,
वाक्य ..व्यंग्य का बनता है।
पदलोलुप, चाटुकार जब,
देशसेवा की लेकर आड़ ,
भर लेते अपनी झोली तब,
कवि कलम आग उगलती है।
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