स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त कविता
शीर्षक-हंस रहा आकाश
हंस रहा आकाश आज,उसे हंसने दो ।
मत बुलाओ धरा पर, दूर ही रहने दो ।
अगर उसे बुलाओगे,
चांद,सूरज,चांदनी भी आएंगे ।
हम कहां रहेंगे विचारो,
हमारे ठौर उनके हो जाएंगे ।
वो हमसे दूर ठीक है, ऐसा ही चलने दो ।
मेघ को कहां छोड़ेगा,
वह भी आ सकता है ।
पास आने पर हवा,
खूब सता सकता है ।
जहां हैं जैसे हैं, वहीं सजने दो ।
मानव की आबादी से,
मानव परेशान है ।
तिल भी रखोगे वहां,
चीखता इंसान है ।
इस बात की अगर है हवा, चुपचाप बहने दो ।
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