स्थान- दुर्ग छ.ग.
विधा -मुक्त
शीर्षक -
*भावना*
देश-प्रेम , विश्व-शांति
परोपकार, दान-पुण्य
लोकहित, गरीबों की सेवा
दुर्बल से सद्व्यवहार ही
है पहचान सच्चे मानव की ।
मन चंचल, अधीर बड़ा है
पल-पल बदले सोच,
ज्यादा पाने की चाह में
करता रहता उलट फेर,
पाप की गठरी भर जाने पर
शांति की करता खोज।
सुख-दुख,संघर्ष,ऊँच-नीच
जीवन की है रीत यही,
चलना है सन्मार्ग पर
सोच सबके लिये हो भली
मिलजुलकर रहना सीखें
मन में ना पालें दुर्भावना
विश्वकल्याण होगा तभी,जब
वसुधैवकुटुंबकम की हो
भावना ।।
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