स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- मुक्तक कविता
शीर्षक- खतरा
खतरा
कदम-कदम पर खतरा, जाएं तो जाएं कहाँ ?
मानव-मानव लड़ रहे हैं, आपस में यहाँ ।
चोरी डकैती अत्याचारी, लोगों का शोषण है ,
आतंक अत्याचार का हो रहा पोषण है ,
कितना सहनशील बनें, अब नहीं जाता सहा।
कदम-कदम पर खतरा, जाएं तो जाएं कहाँ ?
जिसकी लाठी उसकी भैंस, हो रहा चरितार्थ।
परोपकारी को छोड़, सिद्ध करते हैं स्वार्थ।
हैवानियत जागृत है, इंसानियत सोया कहाँ?
कदम-कदम पर खतरा, जाएं तो जाएं कहाँ?
मानव की दुर्भावना का, जब हो जाये अंत।
सदाचारी बन जाएं, जैसे होते साधू-संत।
खुशहाल होंगे सब , बंधुत्व होगा तब यहाँ ।
कदम-कदम पर खतरा, जाएं तो जाएं कहाँ ?
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