जिला -राजनांदगांव
राज्य-छत्तीसगढ़
शीर्षक- "वृक्ष" जीवन का आधार
विधा-कविता
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वृक्ष करे बस यही पुकार,
हे मानव ,सुन मेरी गुहार।।
मत काट मुझे,
मै ही तेरे जीवन का आधार।।
मुझसे ही पाया जीवन,
मुझमें ही समाया जीवन।
करूँ मैं तेरे सपने साकार,
बिन मेरे इस धरती में हाहाकार।।
हे मानव ,मत काट मुझे,
मैं ही तेरे जीवन का आधार।।
प्राप्त कर ले चाहे अपार शक्तियाँ,
पूरा भर ले अपनी खाली झोलियाँ।
बिन मेरे ये धरती है सूनी,
जीवन में हो जायेगा अंधकार।
हे मानव ,मत काट मुझे,
मैं ही तेरे जीवन का आधार।।
बिन मेरे न छांव मिले,
शहर गलियाँ न गांव मिले।
न मिले हवा न पानी,
न बचपन न ही जवानी।।
बिन मेरे ये धरा, न कर सके श्रृंगार।
हे मानव, मत काट मुझे,
मैं ही तेरे जीवन का आधार।।
तू याचक मैं दाता,
तू पुत्र मेरे, मैं सबकी माता।
स्वार्थ और लालच में तू लाचार,
लटक रही अब तेरे जीवन में तलवार।।
खुद की कब्र खोद डाली ,
अब जिंदगी के होंगे दिन चार।।
हे मानव,मत काट मुझे,
मैं ही तेरे जीवन का आधार।
मैं ही तेरे जीवन का आधार।।
(वृक्ष हमारी माँ सामान होती है,हम पर सब कुछ लुटाकर भी,हमसे मोल नही लेती।अधिक से अधिक वृक्षारोपण करे।)
रचनाकार- महदीप जंघेल, खैरागढ़
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