जिला - बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
शीर्षक - मौत का ही द्वार है
विधा - मनहरण घनाक्षरी छंद
1.
तन-मन नाश किया, पूरा ही विनाश किया
जन-जन पर आज, नशा का ही मार है ।
लोग भले मर रहें, शूली पर चढ़ रहें
उनका तो फल-फूल, रहा जी व्यापार है ।
छोटे-बड़े जाने नहीं, नेकी-बदी माने नहीं
ऊँचे-ऊँचे महलों में, बड़ा कारोबार है ।
एक बार मौज लगे, फिर लत रोज लगे
पीछा नहीं छोड़े ये तो, मौत का ही द्वार है ।।
2.
दामन में दाग लगे, चारों ओर आग लगे।
बडे़ - बडे़ नाम भी तो, हुए तार-तार है।।
बडे़ जिसे मानते थे, नेक बड़ा जानते थे।
नशा का तो आज वही, हुआ जी शिकार है।।
जिस पर मरते हैं, देख आहें भरते हैं।
पता चला आज वही, खुद ही बिमार है।।
नशे में ही घुल जाना, सब कुछ भूल जाना।
मानसिक रोग का ये, कैसा उपचार है।।
सत्यधर बान्धे "ईमान"
बेमेतरा छत्तीसगढ़
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