जिला :- महासमुंद
विषय :- शीतलता
शीर्षक :- शरद ऋतु व शीतलता
विधा :- मुक्त
#######################
बरखा के पानी से जब,
धूली धरा की अनुपम काया।
संग शरद के नव जीवन में,
शीतलता का रंग पाया।
बहती ठंडी शीतल लहरें,
रोम - रोम में ऊर्जा भरती।
सुबह सबेरे ओस चमकती,
वसुधा का श्रृंगार है करती।
शीतलता पाकर पौधों में,
नव जीवन की आस जगी।
ओस की बूंदों में लिपटी,
बगीया में स्वर्णिम गेंदे लगी।
उपवन सजे हैं रंग - बिरंगे,
रंग - बिरंगे ऊनी कपड़े।
धूँध भरे शीतल सुबह में,
मंजिल को खगदल चल उड़े।
#######################
व्याख्या:- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने शरद ऋतु में शीतलता व इस शीतल वातावरण में वसुधा की श्रृंगारित सुन्दरता का वर्णन करने का प्रयास किया है।
No comments:
Post a Comment