सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-मुक्त
विषय-शीतलता
सुबह -सवेरे शीतलता देती
मेरे आंगन का वो नीम
खुद कड़वा घूंट पीकर भी
तन-मन को स्फुरित करती
वाणी में शीतलता हो तो
रिश्तों की महक बढ़ जाती
सुकून भरा होता जीवन
अपनेपन से भर जाती
शरद ऋतु की शीतल पवन
अंग -अंग को सिहरन देती
अंगीठी जला जब बैठते सब
अनुभवों की पोटली खुलती
शीतल आचरण जो जिसका
जग में प्यार,सम्मान है पाता
मरने के बाद भी संसार में
उसका नाम गुंजित ही रहता।
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