स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता (वाक्यर्थोपमा अलंकार का प्रयोग)
शीर्षक -"बुनकर"
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बुनकर धागों में घुस जाए
ज्यों रेशे गूथ धागा बनाए
किस्मत उसकी मानो चमकी
यथा कीट मकड़ जाल फस जाए
बसन बना बदन ढकाये
ज्यों कृष्ण द्रोपति बचाए
श्रम से स्वेद नहर बहाये
यथा निर्झर नीर नहाए
बुनकर करते श्रम महान
ज्यों करघा बनाये परिधान
तब वह रोजी-रोटी कमाये
देकर हमें पट थान
मील ने मिलकर काटे कर
यथा दानव भक्छे नर
परिवार पोषण कैसे चलाएं
जो मिले न फल श्रम कर
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वाक्यर्थोपमा अलंकार-
बुनकर धागों में घुस जाए
ज्यों रेशे गूथ धागा बनाए
किस्मत उसकी मानो चमकी
यथा कीट मकड़ जाल फस जाए
बसन बना बदन ढकाये
ज्यों कृष्ण द्रोपति बचाए
श्रम से स्वेद नहर बहाये
यथा निर्झर नीर नहाए
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