स्थान - दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त,वाक्यार्थोपमा अलंकार
शीर्षक - *संघर्षरत जुलाहे*
जन्म से मृत्यु तक मर्यादा
बचाती, बुनकरो के कपड़े,
ऊँगलियों को घंटो उलझाते
ताने-बाने में कालीन के
देते मखमली रंगत, बनाते
लिहाफ, रजाई, कंबल,
कुछ सपने अपने लिये भी
बुने होंगे, जैसे जीते हैं सभी,
भीषण मँहगाई का है दौर
और इनके चेहरे उदास,
कुटीर उद्योग सब बंद हुये
बिना रोजगार क्या करे बेचारे,
जीवकोपार्जन बनी समस्या
पलायन करने ये मजबूर हुये
निज घर छोड़ मजदूर बने,
दिहाड़ी के कम पैसो से कैसे
दो वक्त की रोटी जुगाड़ करें,
फैशन का नया दौर आया
स्वदेशी पीछे छुटते गया,
मशीनें हाथकरघा की बंद पड़ी
जुलाहों के जीवन में समस्या बढ़ी।
दिन इनके भी बहुरेंगे कभी एक आस लगाये बैठे हैं,
ज्यों बारिश के आने से चेहरे किसानों के खिल उठते हैं।।
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